भारत सरकार द्वारा चलाई जा रही ज्ञान भारतम मिशन के अंतर्गत भारतीय ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक विरासत एवं दुर्लभ पांडुलिपियों के संरक्षण हेतु किए जा रहे प्रयासों में बक्सर जिला अंतर्गत लक्ष्मीकांत मुकुल के पैतृक पारिवारिक संग्रह से हाल ही में संत कवि दरियादास (बिहार वाले) की संतमत और भक्ति परंपरा से संबंधित तीन अत्यंत दुर्लभ हस्तलिखित पोथियाँ प्राप्त हुई हैं। ये पांडुलिपियाँ इनके दादा जी द्वारा वर्षों पहले सुरक्षित रखी गई थीं और पीढ़ियों से परिवार की धरोहर के रूप में संरक्षित रही हैं। यह जानकारी वह स्वयं उप विकास आयुक्त बक्सर एवं जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी बक्सर को दिए।
प्रारंभिक अध्ययन और उनकी भौतिक बनावट के आधार पर अनुमान है कि इनका निर्माण लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व हुआ होगा। यदि यह अनुमान प्रमाणित होता है, तो ये न केवल दरियादास के साहित्य के अध्ययन के लिए बल्कि उत्तर भारत की संत परंपरा, लोकभाषा और पांडुलिपि संस्कृति के इतिहास के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत सिद्ध हो सकती हैं।
इन तीनों पोथियों का निर्माण हाथ से तैयार किए गए मोटे देशी कागज पर किया गया है। लेखन में प्राकृतिक स्रोतों से निर्मित स्याही का उपयोग हुआ है और अक्षरों का विन्यास कैथी लिपि में है। भाषा भोजपुरी मिश्रित अवधी है, जो उस कालखंड की लोक-सांस्कृतिक चेतना और क्षेत्रीय भाषिक संरचना का सजीव प्रमाण प्रस्तुत करती है।
इन पांडुलिपियों को देखकर स्पष्ट होता है कि इन्हें केवल धार्मिक पाठ के रूप में नहीं, बल्कि साधना, अध्ययन और परंपरा के संरक्षण के उद्देश्य से अत्यंत सावधानीपूर्वक लिखा गया था।
इन पोथियों का आकार अपेक्षाकृत छोटा है और प्रत्येक में लगभग पचास से सत्तर पृष्ठ हैं। पहली पांडुलिपि ‘सतनाम स्तुति’ पर केंद्रित है, जिसमें संतमत की मूल साधना, नाम-स्मरण और निर्गुण भक्ति की वैचारिक अभिव्यक्ति दिखाई देती है। दूसरी पांडुलिपि ‘प्रेम मूला’ है, जिसे दरियादास की मौलिक रचना माना जाता है। इसमें प्रेम को आध्यात्मिक साधना का आधार मानते हुए भक्ति और आत्मबोध की व्याख्या की गई है। तीसरी पांडुलिपि विशेष रूप से उल्लेखनीय है क्योंकि उसमें भक्ति धारा और संतमत धारा के समन्वय का प्रयास दिखाई देता है।
यह ग्रंथ वैचारिक दृष्टि से उस समय के आध्यात्मिक विमर्श को समझने के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
इन पांडुलिपियों का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि वे प्राचीन हैं, बल्कि इसलिए भी है कि वे उस ज्ञान-परंपरा की प्रतिनिधि हैं जिसे मुख्यधारा के इतिहास लेखन में अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाया। संत कवि दरियादास ने बिहार और पूर्वांचल के लोकजीवन में निर्गुण भक्ति, सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक समानता के विचारों को लोकप्रिय बनाया। उनके साहित्य का एक बड़ा हिस्सा आज भी बिखरा हुआ है और अनेक रचनाएँ अप्रकाशित या निजी संग्रहों में सुरक्षित हैं। ऐसे में इन हस्तलिखित पोथियों की प्राप्ति शोधकर्ताओं, इतिहासकारों और भाषा-वैज्ञानिकों के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोल सकती है।