लेखिका: नेहा चौधरी
भारतीय संस्कृति की विशाल धारा में यदि कोई ऐसी परंपरा है जिसने हजारों वर्षों से मानव को शरीर, मन और आत्मा के संतुलन का मार्ग दिखाया है, तो वह है योग। जब हम योग शब्द सुनते हैं, तो प्रायः आँखों के सामने कठिन आसनों की तस्वीर उभरती है। कुछ लोगों को लगता है कि योग केवल सुबह चार बजे उठकर उल्टे-सीधे आसन करने का नाम है। लेकिन सच तो यह है कि यदि जीवन एक वीणा है, तो योग उसकी मधुर स्वर-लहरी है, जो शरीर, मन और आत्मा को एक सुर में बाँध देती है। योग केवल कुछ आसनों का समूह नहीं, बल्कि एक जीवन-दर्शन है। यह भारत की उस प्राचीन चेतना का प्रतीक है जो मनुष्य को प्रकृति, समाज और स्वयं के साथ सामंजस्य स्थापित करना सिखाती है।
श्लोक है कि
“योगः कर्मसु कौशलम्।”
अर्थात् कर्मों में कुशलता ही योग है।
तो आज जब पूरा विश्व तनाव, अवसाद, जीवनशैली संबंधी रोगों और मानसिक असंतुलन जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब भारत की यह अमूल्य धरोहर मानवता के लिए आशा का दीपक बनकर उभरी है।
योग की उत्पत्ति: सभ्यता जितनी पुरानी परंपरा:-
योग की जड़ें भारतीय इतिहास की गहराइयों तक फैली हुई हैं। वेदों, उपनिषदों, महाभारत और भगवद्गीता में योग का विस्तृत वर्णन मिलता है। कठोपनिषद् में कहा गया है:
“तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्।”
अर्थात् इंद्रियों की स्थिरता और नियंत्रण को ही योग कहा गया है। लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में महर्षि पतंजलि ने योग के सिद्धांतों को व्यवस्थित रूप प्रदान किया और योगसूत्र की रचना की। उन्होंने योग को परिभाषित करते हुए कहा:
“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।”
अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है। इस प्रकार योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि मन को एकाग्र करने और आत्मबोध की दिशा में बढ़ने की वैज्ञानिक प्रक्रिया है।
भारतीय जनमानस में योग का विस्तार
भारत में योग सदैव जनजीवन का हिस्सा रहा है। ऋषियों के आश्रमों से लेकर गृहस्थ जीवन तक, योग के विभिन्न रूपों का अभ्यास होता रहा। प्रातःकाल ध्यान करना, सूर्य को अर्घ्य देना, प्राणायाम करना, संयमित भोजन करना और प्रकृति के अनुरूप दिनचर्या अपनाना भारतीय जीवनशैली का अभिन्न अंग था। आजकल लोग मोबाइल की बैटरी पाँच प्रतिशत होते ही चार्जर खोजने लगते हैं, लेकिन स्वयं की “ऊर्जा बैटरी” कब शून्य के करीब पहुँच जाती है, इसका ध्यान नहीं रखते। तो योग उसी शारीरिक और आत्मिक चार्जर का काम करता है
अच्छा योग कोई आज का कॉन्सेप्ट नहीं है पुरातन काल के अलावा आधुनिक काल में स्वामी विवेकानंद जब 19वीं शताब्दी में 1893 में शिकागो धर्म संसद में भारत की आध्यात्मिक विरासत का परिचय दे रहे थे तब उन्होंने योग के मूल भाव अर्थात् मानव एकता और आत्मिक विकास की अवधारणा को भी विश्व के समक्ष रखा।
इसके बाद 20वीं शताब्दी में बी.के.एस. अयंगर, पट्टाभि जोइस और अन्य योगाचार्यों ने योग को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
और 21वीं बाबा रामदेव के योग को घर घर पहुंचाने की कोशिश को कौन नकार सकता है
जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में योग का उपयोग
योग व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। नियमित योगाभ्यास से शारीरिक लचीलापन बढ़ता है, मांसपेशियाँ सुदृढ़ होती हैं तथा पाचन एवं श्वसन प्रणाली बेहतर ढंग से कार्य करती है। विभिन्न शोधों में यह पाया गया है कि योग तनाव को कम करने, रक्तचाप को नियंत्रित रखने तथा मधुमेह जैसी जीवनशैली संबंधी बीमारियों के प्रबंधन में सहायक हो सकता है।
मानसिक स्तर पर योग एकाग्रता, धैर्य और आत्मविश्वास को बढ़ाता है। विद्यार्थियों के लिए यह परीक्षा के तनाव को कम करने का माध्यम बन सकता है, जबकि कार्यरत व्यक्तियों के लिए यह कार्यक्षमता और भावनात्मक संतुलन को सुदृढ़ करता है। हल्के-फुल्के अंदाज में कहा जाए तो, योग हमें यह सिखाता है कि जीवन में केवल शरीर को “फिट” रखना पर्याप्त नहीं है; मन की “वाई-फाई कनेक्टिविटी” भी मजबूत होनी चाहिए। ध्यान और प्राणायाम इसी आंतरिक नेटवर्क को सुदृढ़ करते हैं।
आध्यात्मिक उन्नति में भी योग व्यक्ति को आत्मचिंतन और आत्मबोध की दिशा में अग्रसर करता है। इसके अलावा चरित्र निर्माण में ये सबसे अधिक सहायक है पतञ्जलि के अष्टांग योग में यम और नियम के माध्यम से सत्य, अहिंसा, अस्तेय, शौच और संतोष जैसे मूल्यों पर बल दिया गया है। ये मूल्य केवल व्यक्तिगत जीवन ही नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता के लिए भी आवश्यक हैं।
योग पर्यावरणीय चेतना को भी प्रोत्साहित करता है। भारतीय चिंतन में मनुष्य को प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका अभिन्न अंग माना गया है। योग हमें सिखाता है कि जिस वायु को हम ग्रहण करते हैं, जिस जल को पीते हैं और जिस पृथ्वी पर चलते हैं, उसके प्रति कृतज्ञता का भाव रखें।
इसी संदर्भ में एक छोटी कविता प्रस्तुत है:
“तन स्वस्थ हो, मन निर्मल हो,
जीवन में मधुर उजास रहे।
योग की पावन साधना में,
हर प्राणी का विश्वास रहे।”
योग के संरक्षण और संवर्धन में संस्थानों की भूमिका
भारत में योग केवल व्यक्तिगत साधना का विषय नहीं है, बल्कि अनेक संस्थानों के माध्यम से इसे व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाया जा रहा है। उत्तराखंड स्थित पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार, विश्व के सबसे बड़े योग एवं आयुर्वेद संस्थानों में से एक है। इसी प्रकार कैवल्यधाम, लोनावला (महाराष्ट्र) योग के वैज्ञानिक अनुसंधान और प्रशिक्षण के लिए प्रसिद्ध है। कर्नाटक का एस-व्यास विश्वविद्यालय (S-VYASA) योग शिक्षा और शोध को उच्च शिक्षा से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है।
बिहार के लिए गर्व की बात है कि मुंगेर स्थित बिहार स्कूल ऑफ योग ने योग को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्वामी सत्यानंद सरस्वती द्वारा स्थापित इस संस्थान ने योग को केवल आसनों तक सीमित न रखकर, उसे जीवन-पद्धति के रूप में प्रस्तुत किया। आज विश्व के अनेक देशों में इसकी शाखाएँ कार्य कर रही हैं।
इन संस्थानों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि योग केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की आवश्यकता भी है।
योग कैसे और कब करना चाहिए?
योग के विषय में एक प्रचलित धारणा है कि इसे केवल प्रातःकाल ही किया जा सकता है। यद्यपि ब्रह्ममुहूर्त अथवा सूर्योदय से पूर्व का समय योगाभ्यास के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि उस समय वातावरण अपेक्षाकृत शांत और मन एकाग्र रहता है, फिर भी व्यक्ति अपनी सुविधा और स्वास्थ्य के अनुसार उचित समय का चयन कर सकता है। अच्छा ध्यान देने वाली बात यह है कि योग एक पूरा पैकेज है इसमें 8 आयाम हैं:
यम, समाज और दूसरों के प्रति हमारा व्यवहार। इसके पांच सिद्धांत हैं – अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह
नियम (व्यक्तिगत अनुशासन): स्वयं के प्रति आचरण और शुद्धता। इसके पांच हिस्से हैं – शौच (स्वच्छता), संतोष, तप, स्वाध्याय (अध्ययन) और ईश्वर प्राणिधान (समर्पण)
आसन (शारीरिक मुद्राएँ): शरीर को स्वस्थ और स्थिर रखने के लिए विभिन्न योग मुद्राएं。
प्राणायाम (श्वास नियंत्रण): प्राण (ऊर्जा) और श्वास को नियंत्रित करने की तकनीक
प्रत्याहार (इंद्रियों पर नियंत्रण): बाहरी दुनिया से ध्यान हटाकर अपनी इंद्रियों को अंतर्मुखी करन
धारणा (एकाग्रता): किसी एक बिंदु या विचार पर मन को स्थिर करना
ध्यान (मेडिटेशन): बिना किसी रुकावट के उसी एकाग्र अवस्था में लगातार बने रहन
समाधि (परम चेतना)
तो इसे केवल आसन यानी शारीरिक मुद्राओं और प्राणायाम को ही नहीं समझना चाहिए बल्कि समग्रता as a whole में देखना चाहिए
हालांकि योगाभ्यास करते समय कुछ सावधानियाँ आवश्यक हैं:-
– योग सदैव खाली पेट या भोजन के तीन से चार घंटे बाद करना चाहिए।
– अभ्यास स्वच्छ एवं हवादार स्थान पर किया जाना चाहिए।
– अपनी आयु और स्वास्थ्य की स्थिति के अनुरूप योगासन चुनने चाहिए।
– गंभीर रोगों की स्थिति में विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित होता है।
– योग में निरंतरता, तीव्रता से अधिक महत्त्वपूर्ण है। प्रतिदिन 20 से 30 मिनट का नियमित अभ्यास भी लाभकारी सिद्ध होता है।
कहा भी गया है:
“धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥”
योग भी धैर्य और निरंतरता की साधना है, तात्कालिक चमत्कार का माध्यम नहीं।

योग के प्रसार हेतु सरकारी एवं गैर-सरकारी पहल
यदि योग को भारतीय विरासत के रूप में आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना है, तो इसके संरक्षण और संवर्धन के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं।
सरकारी स्तर पर निम्नलिखित पहल की जा सकती हैं:
– विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में योग शिक्षा को व्यवहारिक रूप में प्रोत्साहित किया जाए।
– ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशिक्षित योग प्रशिक्षकों की नियुक्ति की जाए।
– सार्वजनिक पार्कों एवं सामुदायिक केंद्रों में निःशुल्क योग शिविर आयोजित किए जाएँ।
– महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों तथा दिव्यांगजनों के लिए विशेष योग कार्यक्रम विकसित किए जाएँ।
– मीडिया और रेडियो के माध्यम से सरल योग अभ्यासों का प्रसार किया जाए।
– वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देकर योग के लाभों का प्रमाण-आधारित प्रचार किया जाए।
– आयुष मंत्रालय की योजनाओं को अधिक व्यापक स्तर पर लागू किया जाए।
गैर-सरकारी स्तर पर भी समाज की भूमिका महत्त्वपूर्ण है
– स्वयंसेवी संस्थाएँ नियमित योग कार्यशालाओं का आयोजन कर सकती हैं।
– कॉर्पोरेट संस्थान अपने कर्मचारियों के लिए योग सत्र प्रारंभ कर सकते हैं।
– परिवारों में बच्चों को छोटी आयु से ही योग और ध्यान की आदत विकसित की जा सकती है।
– सामाजिक एवं धार्मिक संस्थाएँ योग को स्वास्थ्य जागरूकता अभियानों से जोड़ सकती हैं।
क्योंकि योग तभी सार्थक होगा जब वह मंचों और उत्सवों से निकलकर घरों के आँगन तक पहुँचेगा।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर योग का योगदान
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर योग आज भारत की सांस्कृतिक कूटनीति का प्रभावशाली माध्यम बन चुका है। सन् 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत के प्रस्ताव पर 177 देशों ने समर्थन दिया और 21 जून को International Day of Yoga के रूप में मनाने का निर्णय लिया।
वर्ष 2015 से प्रतिवर्ष विश्वभर में करोड़ों लोग इस दिन योगाभ्यास करते हैं। यह केवल भारत की सांस्कृतिक विजय नहीं, बल्कि “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना का वैश्विक विस्तार है। इसके अलावा आज स्थिति यह है कि योग भारत की सीमाओं को पार कर वैश्विक जन-आंदोलन का रूप ले चुका है और करोड़ों लोग इसे स्वस्थ एवं संतुलित जीवन की कुंजी के रूप में अपना रहे हैं। योग ने यह सिद्ध किया है कि प्राचीन ज्ञान आधुनिक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर सकता है।
वर्तमान समय में योग की प्रासंगिकता
आज का युग तीव्र प्रतिस्पर्धा, भागदौड़ और डिजिटल निर्भरता का युग है। बच्चे स्क्रीन टाइम से प्रभावित हैं, युवा तनावग्रस्त हैं और वृद्धजन जीवनशैली संबंधी रोगों से जूझ रहे हैं।ऐसे समय में योग की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है क्योंकि यह हमें सिखाता है कि बाहरी उपलब्धियों के साथ-साथ आंतरिक संतुलन भी आवश्यक है।
योग हमें सिखाता है कि स्वास्थ्य केवल रोग का अभाव नहीं, बल्कि शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण की अवस्था है।
दरअसल योग का उद्देश्य है:
“योगः स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम्,
आतुरस्य विकार प्रशमनम्।”
अर्थात् स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना तथा रोगग्रस्त व्यक्ति के कष्टों का शमन करना ही योग का उद्देश्य है।
उपसंहार
भारतीय विरासत में योग केवल एक अभ्यास नहीं, बल्कि जीवन का उत्सव है। यह हमें स्वयं से जुड़ना, दूसरों के प्रति करुणा रखना और प्रकृति के साथ संतुलन स्थापित करना सिखाता है। आज आवश्यकता है कि हम योग को केवल एक दिवस तक सीमित न रखें, बल्कि उसे अपने दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएँ।
अंत में एक सद्भावना संदेश के साथ आज के कार्यक्रम को अपमान की तरफ ले जाते हैं कि
“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥”
अर्थात् सभी सुखी हों, सभी निरोग हों, सभी मंगल का अनुभव करें और कोई भी दुःख का भागी न बने। यही योग का संदेश है। यही भारत की शाश्वत चेतना है। और यही हमारी सांस्कृतिक विरासत की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति है, जो विश्व के लिए उपहार है और मानवता के लिए आशा की एक उज्ज्वल किरण है।